Larest Hindu Temple: हिन्दुओ के देश भारत में नहीं बल्कि इस देश में है दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर, नाम जानकर हैरान रह जाएंगे आप

 
Larest Hindu Temple: हिन्दुओ के देश भारत में नहीं बल्कि इस देश में है दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर, नाम जानकर हैरान रह जाएंगे आप

लाइफस्टाइल न्यूज डेस्क।। पूरी दुनिया में कोरोना वायरस कहर बरपा रहा है. इस महामारी को देखते हुए दुनिया के सभी देशों में मंदिर, मस्जिद और सार्वजनिक स्थल बंद कर दिए गए। अब इन जगहों को कोरोना के बीच फिर से खोला जा रहा है। इस बीच कंबोडिया का अंगकोर वाट मंदिर भी पिछले दिनों खुल चुका है। अंकोरवाट दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर है। आपको यह सुनकर थोड़ा अजीब लग सकता है कि दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर भारत में नहीं बल्कि कंबोडिया में है। जबकि भारत में सबसे ज्यादा हिंदू रहते हैं। इस मंदिर की खास बात यह है कि हिंदू और बौद्ध दोनों धर्मों के लोग इस मंदिर को अपना धार्मिक स्थान मानते हैं। इसी वजह से यह मंदिर सबसे ज्यादा संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

अंगकोर वाट अपनी स्थापना के समय हिंदू धर्म को समर्पित था, लेकिन बाद में इसे बौद्ध मंदिर में बदल दिया गया। हालांकि, हिंदू और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग समान विश्वास साझा करते हैं। यह मंदिर कंबोडिया की राजधानी नोम पेन्ह से 206 किमी की दूरी पर है। इसे दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक भी कहा जाता है। 2019 में इस मंदिर में लगभग 22 लाख पर्यटकों ने दर्शन किए। कंबोडिया में बना यह मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा और भव्य मंदिर है। मंदिर अंगकोर के सिमरीप शहर में मेकांग नदी के तट पर बनाया गया है।

Larest Hindu Temple: हिन्दुओ के देश भारत में नहीं बल्कि इस देश में है दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर, नाम जानकर हैरान रह जाएंगे आप

कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में राजा सूर्य वर्मन द्वितीय ने करवाया था। उस समय यह स्थान खमेर साम्राज्य की राजधानी यशोधरापुर था। जानकारों के अनुसार खमेर वंश शैव मत का अनुयायी था। यानी वे भगवान शिव को मानते थे। लेकिन फिर भी राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने भगवान विष्णु के इस मंदिर का निर्माण कराया। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मंदिर 500 एकड़ में फैला है। इंडोनेशिया के निवासी इसे जलमग्न मंदिर भी कहते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मंदिर के दर्शन के लिए 20 लाख पर्यटक कंबोडिया आते हैं।

यह मंदिर खमेर राजवंश वास्तुकला की शास्त्रीय शैली का परिचय देता है। इस मंदिर को मेरु पर्वत का एक रूप माना जाता है। कंबोडिया को पहले कम्पूचिया के नाम से जाना जाता था। यहाँ हिन्दू और बौद्ध धर्म का राज्य था। यहाँ पूरे एशिया में खमेर साम्राज्य का दबदबा था। कंबोडिया दक्षिण पूर्व एशिया में स्थित है। इसकी आबादी करीब 1.5 करोड़ है। पूर्वी एशिया में और भी कई मंदिर मिले हैं। कंबोडिया ने भी इस मंदिर को अपने राष्ट्रीय ध्वज में स्थापित किया है। इसके अलावा इसे अफगानिस्तान के राष्ट्रीय ध्वज में भी दर्शाया गया है। इस मंदिर को 1992 में यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल किया गया था।

इस मंदिर की कुछ खास विशेषताएं हैं, जो इसे अन्य मंदिरों से अलग बनाती हैं। इस मंदिर का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में है। वैसे तो हिंदू मंदिरों के द्वार पूर्व दिशा में होते हैं। उगते सूरज की रोशनी हर मंदिर तक पहुंचती है। जब इस मंदिर का द्वार पश्चिम दिशा में होता है तो सूर्य इस मंदिर को प्रणाम करता है। मंदिर की दीवारों पर विभिन्न देवी-देवताओं की पेंटिंग और मूर्तियां और धार्मिक-पौराणिक कथाओं को उकेरा गया है। मंदिर की दीवारों पर अप्सराओं के चित्र भी उकेरे गए हैं। समुद्र मंथन के दृश्य भी हैं।

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