क्या आपको पता है कुंभ मेले से जुड़ा रहस्य और इतिहास

 
क्या आपको पता है कुंभ मेले से जुड़ा रहस्य और इतिहास

लाइफस्टाइल न्यूज डेस्क।। कुंभ पर्व स्थल हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में स्नान करते हैं। इसके अलावा का कुम्भ पर्व चार हिस्सों में बंटा हुआ। कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है। जैसे कि अगर पहला कुंभ हरिद्वार में होता है तो ठीक उसके 3 साल बाद दूसरा कुंभ प्रयाग में और फिर तीसरा कुंभ 3 साल बाद उज्जैन में, और फिर 3 साल बाद चौथा कुंभ नासिक में होता है। जिसमें लाखों करोड़ों श्रद्धालु इनमें से प्रति 12 वर्ष बाद महाकुंभ यानि पूर्ण कुंभ का आयोजन किया जाता है। 

हरिद्वार और प्रयाग में 2 कुंभ पर्व के बीच 6 वर्ष के अंतराल में अर्धकुंभ भी मनाया जाता है। और आखिरी अर्धकुंभ 2016 में हरिद्वार में आयोजित किया गया था। ठीक इसी तरह 4 कुंभ पर्व को मिलाकर 12 वर्ष हो जाते हैं। तब महाकुंभ यानि पूर्ण कुंभ मनाया जाता है, जो कि 12 वर्षों में एक बार होता है। 

कुंभ के पावन पर्व पर चारों ओर श्रद्धालुओं की भीड़, साधु, विद्वान, ऋषि-मुनि और श्रद्धालुजन कुंभ मेले के दौरान पवित्र जल में डुबकी लगाकर खुद को पवित्र करते हैं। कुम्भ एक ऐसा पर्व है, ऐसा त्यौहार है जिसे अगर कोई अपनी आंखों से ना देखें तो वह इसे नहीं समझ सकता। इसका महत्व और मेले का उल्लास वही समझ सकता है जिसने खुद कुंभ के अद्भुत और पवित्र वातावरण को प्रत्यक्ष देखा और महसूस किया है।  प्रदोष को कुंभ का महत्व यहीं तक सीमित नहीं है चलिए आपको बतलाते हैं कुंभ पर्व के इतिहास के बारे में कि आखिर कुंभ की शुरुआत क्यों हुई? और यह सिर्फ हरिद्वार, प्रयाग उज्जैन और नासिक में ही क्यों मनाया जाता है? कहते हैं कि आज के लोगों के लिए कुंभ मेला वो जगह है जहां जाकर पवित्र जल में डुबकी लगाते है और पापों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। और चाहते हैं कि भगवान उन्हें मोक्ष प्रदान करें। 

कुंभ का इतिहास
सब देवता मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृतांत सुनाया। तब भगवान विष्णु ने देवताओं को दैत्यों के साथ मिलकर क्षीर सागर का मंथन करके अमृत निकालने की सलाह दी। यह कहानी समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। कहते हैं महर्षि दुर्वासा के श्राप के कारण जब इंद्र और देवता कमजोर पड़ गए, तब राक्षस ने देवताओं पर आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया था। 

कहते हैं कि इस युद्ध के दौरान पृथ्वी के चार स्थानों पर अमृत कलश से अमृत की बूंदे गिरी थी। जिनमें से पहली बूंद प्रयाग में गिरी तो दूसरी शिव की नगरी हरिद्वार में इसके बाद तीसरी बूंद उज्जैन में तो चौथी बूंद नासिक में जा गिरी। उसके बाद दैत्य गुरु शुक्राचार्य के आदेश पर राक्षसों ने अमृत लाने के लिए जयंत का पीछा किया, और घोर परिश्रम के बाद उन्होंने बीच रास्ते में ही जयंत को पकड़ा और अमृत कलश पर अधिकार जमाने के लिए देव और दानव में 12 दिन तक भयंकर युद्ध होता रहा। 

 भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर संपूर्ण देवता राक्षसों के साथ संधि करके अमृत निकालने के प्रयास में लग गए। समुद्र मंथन से अमृत निकलते ही देवताओं के इशारे पर इंद्र पुत्र ‘जयंत’ अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गया।  यही कारण है कि कुंभ के मेले को इन्हीं चार स्थानों पर मनाया जाता है। देवताओं के 12 दिन, मनुष्य के 12 वर्ष के तुल्य होते हैं। अतः कुंभ भी 12 होते हैं। उनमें से 4 कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और शेष 8 कुंभ देवलोक में होते हैं, जिन्हें देवगन हि प्राप्त कर सकते हैं। चलिए ज्योतिष के अनुसार जानते है की आखिर कुंभ पर्व के आयोजन की तिथि और जगह कैसे निर्धारित की जाती है।

क्या आपको पता है कुंभ मेले से जुड़ा रहस्य और इतिहास

कुंभ आयोजन की तिथि
जब बृहस्पति वृषभ राशि में प्रवेश करता है और सूर्य मकर राशि में होता है तो यह उत्सव प्रयाग में मनाया जाता है। जब बृहस्पति और सूर्य का सिंह राशि में प्रवेश होता है तब यह महाकुंभ मेला महाराष्ट्र के नासिक में मनाया जाता है। कहते हैं कि कुंभ मेले में सूर्य और बृहस्पति का खास योगदान माना जाता है। सूर्य देव एवं गुरु बृहस्पति एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं तभी कुंभ मेले को मनाने का स्थान और तिथि का चुनाव किया जाता है। तो इसी के अनुसार जब सूर्य मेष राशि और बृहस्पति कुंभ राशि में आता है तब यह कुम्भ मेला हरिद्वार में मनाया जाता है। 

सूर्य देव का सिंह राशि में प्रवेश होने के कारण मध्यप्रदेश के उज्जैन में मनाया जाने वाला कुंभ सिंहस्थ कुंभ कहलाता है। पिछला सिंहस्थ कुंभ अप्रैल 2016 में आयोजित किया गया था। यह पर्व 12 वर्ष के पश्चात उज्जैन की भूमि पर मनाया गया। इसके अलावा बृहस्पति सूर्य और चंद्रमा तीनों कर्क राशि में प्रवेश करें और साथ ही अमावस्या का दिन हो तब भी कुंभ नासिक में ही मनाया जाता है। और अंत में कुंभ मेला उज्जैन में तब मनाया जाता है जब बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करें और सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश कर रहे हो। 

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यह चार पवित्र नदियां हैं हरिद्वार में गंगा, नासिक में गोदावरी, इलाहाबाद में संगम यानी गंगा जमुना सरस्वती और उज्जैन में शिप्रा नदी की। इनसब का अपनी महिमा और महत्व है। गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी महा नदियों की तरह शिप्रा नदी भी महान है। शिप्रा नदी को पहाड़ों से बहने वाली नदी कहा जाता है।  पौराणिक कथाओं के अनुसार अमृत कलश से अमृत की चार बूंदे जो धरती पर गिरी थी वह नदी में रूप ले लिया। लेकिन मान्यतानुसार यह नदी धरती के कोख से जन्म ली थी। कहते हैं कि इस नदी का जल इतना पवित्र है कि इसमें स्नान करने वाले लोगों के सभी कष्ट और दुख दूर हो जाते हैं और जीवन में खुशहाली आती है।

यहां स्नान से देव लोक भी प्राप्त होता है। भविष्य पुराण के अनुसार कुंभ स्नान से पुण्य स्व स्वरुप मिलता है, और मोक्ष की प्राप्ति होती है। कुर्मा पुराण के अनुसार कुंभ उत्सव में स्नान करने से सभी पापों का विनाश होता है, और मनोवांछित फल प्राप्त होता है।  स्कंद पुराण में यह उल्लेख मिलता है की भारत के सभी पवित्र नदियां उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है, लेकिन शिप्रा नदी एक ऐसी नदी है जो उत्तरगामी है यानी कि यह उत्तर दिशा की ओर बहने वाली नदी है। आगे चलकर यह चंबल उप नदी में मिल जाती है। 

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