नशे की लत का शिकार होकर दम तोड़ती युवा पीढ़ी, क्या है इसका प्रमुख कारण

 
नशे की लत का शिकार होकर दम तोड़ती युवा पीढ़ी, क्या है इसका प्रमुख कारण

लाइफस्टाइल न्यूज डेस्क।। आजकल के बदलते लाइफस्टाइल में हमारे देश में नशा एक ऐसा अभिशाप बन कर उभर रहा है जो हमारे युवाओं को तेजी से अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है। और साल-दर-साल इन युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आधुनिक जीवन शैली,बढ़ता तनाव, अकेलापन, दिनों दिन बढती प्रतिस्पर्धा ,रोजगार सम्बन्धित परेशानियां ,असफल प्रेम संबंध, आर्थिक परेशानियां ,भारतीय संस्कृति पर हावी पाश्चात्य जीवन शैली।शायद इन युवाओं का झुकाव नशे की तरफ ले जाता है। शराब, गुटखा, तम्बाकू, बीड़ी-सिगरेट, कोरेक्स, ड्रग्स, नशीली टेबलेट्स, चरस,गांजा, अफीम, स्मैक सहित भांति-भांति के नशीले पदार्थों की खेप पर खेप बड़े स्तर से लेकर छोटे स्तर तक बड़ी सुगमता से पहुंच रही है।

हमारी संवैधानिक व्यवस्था भले ही बालश्रम निषेध की बात करती हो लेकिन हकीकत कुछ और है जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता बल्कि सच्चाई को स्वीकार करने की आदत हमें डालनी होगी। संवैधानिक उपबन्धों एवं बालश्रम को रोकने की बात करने वाले एनजीओ एवं अन्य संस्थाओं की भरमार भले ही लेकिन स्थिति इतनी बदतर है कि बालश्रम पर अंकुश आज तक नहीं लगाया जा सकता है। यह उसी का ​परिणाम है कि शहरों एवं कस्बों में कबाड़ बीनने वाले छोटे-छोटे नौनिहाल तक वाहनों के पंचर बनाने में प्रयुक्त होने वाले द्रव पदार्थ साल्यूशन को भी नशे के तौर पर सूंघते हैं।

नशे का प्रसार इतना बढ चुका है कि बच्चे किशोरावस्था से ही इसकी चपेट में आने लग जाते हैं। यह स्तर अनुमानतः नौवीं कक्षा से लगभग शुरु हो जाता है, बच्चे घर से ट्यूशन /कोचिंग के लिए जाते हैं तथा पान की गुमटियों से सिगरेट की फूंक मारनी प्रारंभ कर देते हैं। एक समय वह भी था जब हमारे समाज में नैतिकता उच्च शिखर पर होती थी, किन्तु समय के साथ इसमें लगातार गिरावट आती गई। लगभग दस वर्ष पीछे के समय में जाएं और आंकलन करें तो हम पाते हैं कि दुकानदार छोटे एवं स्कूली बच्चों को गुटखा, सिगरेट इत्यादि किसी भी कीमत पर नहीं देते थे, बल्कि उल्टे डांट-डपट कर हिदायत दे देते थे। लेकिन जब से आधुनिकता की भेड़ चाल चलने की लत लगी तो स्थितियां ठीक उलट हो गईं, आजकल तो चाय-पान ठेले वाले स्कूली बच्चों को ही अपना स्थायी ग्राहक बनाकर उनके लिए सरलता से नशा करने का अड्डा उपलब्ध करवाते हैं। हालात यह हैं कि नौंवी से लेकर बारहवीं कक्षा तक के बच्चे सामान्यतः सिगरेट एवं गुटखा का सेवन चोरी-छिपे शुरू कर देते हैं, जो आगे चलकर उम्र के पड़ाव के अनुसार अन्य नशों की चपेट में आने लग जाते हैं।

नशे की लत का शिकार होकर दम तोड़ती युवा पीढ़ी, क्या है इसका प्रमुख कारण

समाज में संयुक्त परिवार के सिमटते दायरे एवं एकल परिवार की अवधारणा के चलते बच्चों की परवरिश में दादा-दादी एवं अन्य सम्बंधों की भूमिका नगण्य हो गई जिसके चलते अब बच्चों की देखभाल एवं जिम्मेदारी केवल माता-पिता के कंधों पर आ गई। जीवन की व्यस्ताओं के चलते माता-पिता का भी बच्चों से नाता लगभग शून्य सा ही रह गया। बच्चों ने जो जैसा बतलाया माता-पिता ने उसे स्वीकार कर लिया, असल में बच्चों के लिए माता-पिता के पास इस बात के लिए समय ही नहीं रह गया कि वे अपने बच्चों की आदतों एवं उनकी दिनचर्या की निगरानी कर सकें। इसी के चलते जब बच्चों पर कोई अंकुश नहीं रह गया तो वे नशे जैसी बुरी आदतों के शिकार होने लग गए।

नशे की लत का शिकार होकर दम तोड़ती युवा पीढ़ी, क्या है इसका प्रमुख कारण

कॉलेज आते -आते नशे का दायरा और भी बढ़ता चला गया तथा बुरी संगत के चलते गुटखे एवं सिगरेट का सेवन करने वाले बच्चे अब वयस्कता के साथ ही शराब, कोरेक्स, गांजा इत्यादि का प्रयोग भी करने लगते हैं। इनमें हम उन्हें भी शामिल कर लें जो स्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ चुके हैं, तो भी हम पाते हैं कि उनमें भी नशे के प्रति आकर्षण उतना ही है। देश के किसी भी शहर/कस्बे/गांव को ले लीजिए आपको अधिकांशतः युवा नशे की लत के शिकार मिल जाएंगे। अनेकानेक ऐसे मामले नित-प्रति देखने को मिलतें हैं कि शराब, कोरेक्स, ड्रग्स, नशीली टेबलेट्स का सेवन करने के कारण युवाओं की किडनी, लीवर,फेफड़े खराब होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं कैंसर एवं अन्य गंभीर बीमारियों के कारण मौत के आंकड़ों में वृद्धि होती चली जा रही है, उसके मूल में सिर्फ एक ही कारण- ‘नशीले पदार्थों’ का सेवन है। नशे के कारण ही चोरी,लूट-पाट, हिंसा में युवाओं की सर्वाधिक आदत इस बात की गवाह है कि नशे ने इस देश के भविष्य को पहले ही उसके विनाश के द्वार खोल दिए हैं।

सवाल यह है कि क्या यह वही युवा पीढ़ी है जिसके कंधों में देश की बागडोर सौंपी जानी है तथा भविष्य के भारत की बुनियाद भी इसी के जिम्मे है? हम अभी तक बात नशे के चक्र की कर रहे थे, लेकिन सबसे अहम् एवं जरूरी बात यह है कि शासन द्वारा जब इन नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध है तो आखिर! नशीले पदार्थ युवाओं तक पहुंच कैसे रहे हैं? क्या सरकार एवं प्रशासन तंत्र सोया हुआ है? यह देखा जाता है कि नशे के कारोबारियों के साथ प्रशासन तंत्र की जुगलबंदी एवं राजनैतिक संरक्षण के चलते नशे का कारोबार धड़ल्ले के साथ चलता रहता है। पूरी युवा पीढ़ी एवं समाज को मौत के मुंह में झोंकने वाले नरपिशाचों पर कभी भी कोई कार्रवाई नहीं होती है, बल्कि नोटों के वजन के आगे आंख मूदकर सबकुछ सही बतला दिया जाता है। सोचिए! जब एक आम आदमी को पता रहता है कि नशे को फला व्यक्ति बांट रहा है तथा फला जगह नशीले पदार्थों के बिक्री का अड्डा है, तो क्या प्रशासन तंत्र को इसकी खबर नहीं होती है?

नशे की लत का शिकार होकर दम तोड़ती युवा पीढ़ी, क्या है इसका प्रमुख कारण

सुप्त पड़े इस समाज को नशे के विरुद्ध मुखर होकर एक क्रांति करनी होगी, क्योंकि यदि इस पर समाज कायरतापूर्वक अपने भीरुपन को लिए हुए चुप्पी साधे बैठा रहा कि हमें इससे क्या फर्क पड़ता है? तो यह मानकर चलिए कि आप भी किसी न किसी दिन नशे एवं इसके दुस्प्रभावों से प्रभावित होंगे, तब आपको अपने अपराध का बोध होगा। दूसरी ओर देश के युवाओं एवं इस समाज को नशे के जहर से बचाने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, चाहे वह हमारा शासन तंत्र हो प्रशासन तंत्र यह उन पर निर्भर करेगा कि वे राष्ट्र के भविष्य को काल के मुंह में झोंकने चाहते हैं या उसे नशे से बचाकर राष्ट्र के उत्थान एवं प्रगति पथ पर लाना चाहते हैं।
 

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